Category Archives: Fiction Section

Science fiction escapades inspired by evolving reality.

Chemical Evolution – Molecules of Life

 

 

 

 

 

 

 

 

Chemical Evolution – Molecules of Life 

” मैं यहाँ पड़े पड़े सड़ने नही वाला! कितने अजीब अजीब से हैं यहाँ सब!

I am not going to waste myself here! How weird everyone is over here.

और कैसे ये रंग बदलते रहते हैं! मुझे अपनों का साथ चाहिए !

And how they keep changing colors! I want company of someone like me.

हम जैसे हज़ारों एक साथ जीएँगे. जो हम जैसे ना हो उनका क्या ?

1000s like me will join and live together. What about those who are not like us ?

क्या वो हमारे साथ है की नही ? हमारे साथ है वो भी जीएँगे!

Are they with us or against us ? If they are with us, they may live

वरना उनकी खैर नही! भाड़ मे जाए! ”

Else to hell with them!”

मन मे ये बात ठान लिए चल दिया बंजारा घुमराह! घाना अंधेरा!

Determined from within, they left, lost and wandering. Deep darkness.

किसी गहरे समुंदर के सतह पर ज्वालामुखी के ऊष्णता से खुद मे जोश भरता हुआ!

Taking fire from some undersea volcanoes, erupting up, riding with their heat.

वहाँ बनते गैस के बुलबुलों के सहारे पत्थरों के बीच पतली पतली दरारें बनाकर.

Surfing on the gas bubbles, making cracks and crevices through rocks and rubbles.

वो निकल पड़ा खुद को संभालकर उसका पानी मे डूबा हुआ सिर

He left for a crazy journey, bracing carefully, his with head inside water

और उसके सिर से सीधे जुड़ा हुआ

And his body attached

किसी पानी से निकाली गयी ज़िंदा मछली की तरह तड़प्ता हुआ लंबा सा पूंछ.

wiggling like a live fish thrown just out of water.

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Inspired by : Chemical Evolution (https://www.richarddawkins.net/2015/05/how-chemical-evolution-may-help-us-discover-the-origins-of-life/)

Stated Clearly: Chemical Evolution Video

 

Eco friendly Fungus

वैसे तो इस धरती मे हर प्राणी, अपने आस पास के माहौल मे कैसे भी जिंदा रहने के लिए और अपने पीढ़ी को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष करते रहते है.
इसे survival of the fittest कहते हैं.

लेकिन कुछ प्राणी ऐसे भी हैं जो इस बदलते संसार मे ऐसी नयी शक्ति लेकर आते हैं जो इससे पहले कभी न मिला हो. ऐसे अचानक से होने वाले परिवर्तन को कहते हैं Mutation! ये म्युटेशन अच्छी हो या बुरी, इसके पीछे कोई ना कोई मज़बूरी तो ज़रूर होगी.

कुछ ऐसा ही हुआ जब बंबई महानगर के सबसे बड़ा कूड़ा दान देवनर डमपिंग ग्राउंड मे, सालों साल से दबे हुए कचरे के पहाड़ मे, एक सफाई कर्मचारी ने मॉडर्न म्युटेशन के ऐसा चमत्कारी नमूना देखा! उन्होने देखा की एक फंगस की प्रजाति ने घास-फूस फल सब्ज़ी छोड़कर प्लास्टिक खाना शुरू कर दिया है! वे दिखने मे भी इतने सुंदर थे जैसे बारिश मे छोटे बच्चों के रंग बिरंगे छतरी!

वो सफाई कर्मचारी, अनिल यादव, कोई मामूली सफाइवाले नही थे जो मज़बूरी मे इस काम को करते थे. बल्कि वेस्ट-मॅनेज्मेंट मे शोध करने वाले उसी बस्ती के २६ साल के वे युवा वैज्ञानिक थे. हालाकी उनका बी.एम.सी के बिगड़े हुए बाबुओं के साथ ३६ का आखड़ा रहता था, लेकिन खुद्रत से, खुद से और आस पास के लोगों से गहरा अटूट रिश्ता था. जब रोज़ाना मामूली काम ख़तम हो जाता था तो बाकी समय वे लोगों को पर्यावरण के बारे मे जागृत करने, और रात भर विज्ञान, समाज शस्त्र आदि पढ़ने मे लगा देते थे.

अलग अलग पर्यावरण के बारे मे, और विभिन्न जीव जंतुओं के बारे मे वे रसायनिक तौर से एक दम अच्छे से वाकिफ़ थे…शायद इसीलिए जैसे ही उन्होने इस खुद्रती चमत्कार को देखा उनकी आँखें खुशी और उम्मीद से भर आई! अगर वे जीवन चक्र के आंतरिक रहस्यों से अंजान होते तो उनके लिए ये अद्बूत नज़ारा आँखों के सामने होते हुए भी अदृश्य होता!

जब वैज्ञानिकों को इनके खोज का पता चला तो पूरे विश्व मे हंगामा हो गया! और शोध करने पर ये पता चला की जितना सुंदर उस फंगस का रूप था उससे और भी सुंदर उसका कम! प्लास्टिक खाने वाले फंगस ना ही इस धीरकालीन प्रदूषक को ख़त्म करते थे, वे उन पदार्थों को पेड़ पौधों के लिए खाद मे भी परिवर्तित कर देते थे! एक तीर से दो निशान!

कुछ हाल फिलहाल मे लोगों को प्लास्टिक की ऐसी लत लग चुकी है की उसके उपयोग का बंद होना तो लगभग नामुमकिन है.
‘बिकम ईको फ्रेंड्ली’, ‘से नो टू प्लास्टिक’ जैसे नारे तो बच्चों मे प्रसिद्ध हो रहे थे लेकिन कई सालों से प्रथा चली आ रही है की जैसे बच्चे बड़े होते हैं तो न्याय-धर्म, आपस मे परस्पर प्रेम जैसे पाठ को भूलकर उसके ठीक उल्टा लोभ और स्वार्थ को ही समझदारी और होशियारी समझते हैं.
नोट बंदी के वजह से तमाम दिक्कतें हुई होंगी पर प्लास्टिक बंद करने के लिए ना पेट्रोकेमिकल उद्योग तैयार है, ना सरकार और न ही आम जनता.

लेकिन अनिल जानते थे की भले केंद्र मे, या राज्य मे, या नगर पालिका मे
कोई भी सरकार आए या जाए,
(भला हो जब आर्थिक-राजनीतिक षड्यंत्र से तमाम लोगों को आज़ादी मिल जाए),
अगर इस ईको-फ्रेंड्ली फंगस का साथ हो,
और इसके अनोखे हरकतों के बारे मे तमाम जानकारी पाने वाले शोध का विकास हो,
तो आम लोगों के और इस सुंदर पृथ्वी के अन्य प्यारे जीवों के लिए,
अच्छे दिन ज़रूर आएँगे!

http://indiatoday.intoday.in/education/story/plastic-eating-fungus/1/921074.html

Chirkut – The Nano Warrior

(Inspired by “Plenty of Room for Biology at the Bottom – An Introduction to Bionanotechnology; Ehud Gazit”)

“छोटा बच्चा समझके मुझे कम न मापना ! मैं इतना छोटा हूँ की तुम देख भी नही सकते!”

“Don’t count me less just because I am small! I am so small that you cannot even see!”

“लेकिन मैं तुम्हे डूंड लूँगा! हा! हा! एक और जानलेवा हमला!”

“But I can find you! Ha! Ha! One more deadly attack!”

चिरकूट के नानो साइज़्ड दिमाग़ मे यही चल रहा था जब उसे तुरंत एमर्जेन्सी हालात मे राजीव के कॅन्सर युक्त खून मे भेजा गया था.

Chirkut’s nano sized brain was buzzing with these thoughts when he was immediately sent into Rajiv’s cancer infested blood in emergency.

चिरकूट आर्टिफीशियली इंटेलिजेंट नानो वॉरईयर है जिसका जन्म कॅन्सर सेल्स को खून मे डूंड डूंड के मारने के लिए ही हुआ.

Chirkut is an artificially intelligent Nano-warrior, taking birth just to find and kill cancer cells in the blood.

चिरकूट अपने पूर्वजों से अलग है. उसके पूर्वज भी लड़ाकू थे लेकिन उन्हे बाइ डिज़ाइन शहीद होना पड़ता था. उनमे इतनी केमिकल समझदारी नही थी.

Chirkut was different from it’s predecessors. They were also fighters but by design the had to be martyred; not possessing enough chemical intelligence.

चिरकूट समझदार है, वो शहीद होने नही, सिकंदर बनने के लिए आया है!

Chirkut is intelligent. He didn’t come to die as a martyr, but to live as a victor!